लंबी कविता ने बीसवीं शताब्दी में केंद्रीय भूमिका निभाई है जो 21वीं सदी की इधर की परिस्थितियों में ने विन्यासो में ढल रही है और महत्वपूर्ण हो गई है नई तरह की कसमसाहट छटपटाहट और बेचैनी जो इन दिनों कमी महसूस कर रहे हैं उससे कविता में लंबी कविता में भी एक नए युग के समारंभ के संकेत मिल रहे हैं वह आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के चौखटों को तोड़कर बाहर आई है नए संदर्भों में पैदा हुए विचार को आत्मसात करने के लिए नए समय की चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए इससे वह जिसके लिए नए प्रयोगों विन्यासों और मॉडलों को अर्जित करने के लिए तत्पर दिखती है इस परिप्रेक्ष्य में नरेंद्र मोहन की लंबी कविताओं को खास तौर पर देखा जा सकता है |
डॉ. गुरु चरण सिंह
जून 1943, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : (अंग्रेजी हिंदी), पी.एच.डी विश्वविद्यालय ।
प्रकाशित साहित्य
उपन्यास यात्रा : डूब जाती है नदी अपना-अपना सच, नाग पर्व ।
आलोचना: नहीं कविता से आज तक समकालीन कविता का मूल्यांकन संदर्भ और नरेंद्र मोहन की कविता समकालीन कविता के सरोकार कविता का समकालीन समकालीन कथा कार और नई कथा कृतियां संवाद के बहाने उपन्यास का समकालीन समकालीन हिंदी (2 खंड) ।
संपादन: कथाकार महेश सिंह खुशबू परछाई और देवेंद्र इस्सर सुदर्शन मजीठिया: सृजन के धरातल नाटकीय शब्द और नरेंद्र मोहन जिंदगी की आज और रंग ललित शुल्क नरेंद्र मोहन रचनावली 12 खंड नाटककार नरेंद्र मोहन परिदृश्य नरेंद्र मोहन के नाटक बाल साहित्य तथा अन्य सच्चा पारखी सुबह का भूला गुरु नानक देव जी, विशिष्ट : पंजाबी हिंदी शब्दकोश संप्रति: श्री गुरु नानक देव खालसा कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से उपाचार्य पद से सेवा निवृत |