गुरु नानक के 550 वें प्रकाश-पर्व को इन दिनों समारोहपूर्वक मनाया जा रहा है | उनकी स्मृति को राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर अक्षुण और चिरस्थायी बनाए रखने के लिए , एक बड़े पैमाने पर वृहत योजनाएं बन रही हैं - संगीत संकीर्तन और प्रवचनों व्याख्यानों के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं | अपने देश में ही नहीं विश्व के अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में गुरुनानक 'चेयर'( विशेष पीठ) की स्थापना की जा रही है , लेकिन की वाणी, जीवन- दर्शन और काव्य के विभिन्न पक्षों में संबंधित परस्पर गुथी हुई कोई रचना या आलोचनात्मक संरचना पुस्तक प्रकाशन की कोई विशिष्ट ढ़ंग की श्रृंखला नजर नहीं आ रही | जिस शब्द में उनके प्राण बसते थे और जिस शब्द के सिवा आम लोगों और कवियों के लिए मुक्ति का कोई रास्ता नहीं बचा है , उसी 'शबद' की साख बचाए रखने और उसे लोक का हिस्सा बनाए रखने का वक्त आ गया है | इधर की गतिविधियों से इतना तो लगता है कि भीतर से बाहर तक फैली उसी शब्द की ध्वनियां हमें आज भी प्रेरित कर रही हैं उस सच को पाने के लिए जिसके बिना जीवन निरर्थक है | गुरु नानक और उनका काव्य और उनका काव्य उस सच से साक्षात्कार करने का एक समवेत प्रयत्न है |
कवि नाटककार और आलोचक के रूप में सुविख्यात डॉ. नरेंद्र मोहन का जन्म 30 जुलाई , 1935 लाहौर|हिंदी विभाग दि.वि. साहित्य का अध्यापन ! सन 2000 में सेवानिवृत्त | भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, बाबासाहेब अंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय औरंगाबाद, गोवा विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर | अपने कविता-संग्रह : इस हादसे में होने से (1975), सामना होने पर (1979), एक अग्निकांड जगहे बदलता (1983), हथेली पर अंगारे की तरह (1990), संकट दृश्य का नहीं (1993), एक खिड़की खुली है अभी (2006), नीले घोड़े का सवार (2008), रंग आकाश में शब्द (2010), शर्मिला इरोम तथा अन्य कविताएं (2014), रंग दे शब्द (2015), नृत्य से कविता (2016), द्वारा वे नए अंदाज में कविता की परिकल्पना करते रहे हैं l अपने नाटकों -कहै कबीर सुनो भाई साधो (1988), सिंगधारी (1988), कलंदर (1991), नो मैंस लैंड (1994), अभंग- गाथा (2000), मि. जिन्ना (2005), हद हो गई यारों (2009), मंच अंधेरे में (2010), और मालिक अकबर (2012), में वे हर बार नई वस्तु और रंग-दृष्टि की तलाश करते दिखते हैं l नई रंगत में ढली उनकी डायरियो-साथ-साथ मेरा साया (2002), से अलग (2010), और डर और साहस के बीच (2018), फ्रेम से बाहर आती तस्वीरें (संस्मरण , 2010) मंटो जिंदा है ( जीवनी, 2012), कमबखत निंदर (आत्मकथा 2013), और क्या हाल सुनावा (आत्मकथा, 2015), ने इस विधाओं को नए मायने दिए हैं l 12 खंडों में नरेंद्र मोहन रचना वाले और दो खंडों में संपूर्ण कविताएं प्रकाशित हो चुकी है l विचार कविता और 'लंबी कविता' के विमर्श के जरिए उन्होंने सृजन और चिंतन के नए आधारों की खोज की है l उनके नाटक, आत्मकथाएं, जीवनी और कविताएं विभिन्न भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में अनूदित हो चुकी है | वे कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार है |
व्यक्तित्व और चिंतन
गुरु नानक : एक जीवन-चित्र - डॉ. हरिराम गुप्ता
गुरु नानक का व्यक्तित्व - प्रेमप्रकाश सिंह
गुरु नानक और उनकी निर्गुण साधना - डॉ. जयराम मिश्र
गुरु नानक का भक्ति दर्शन- डॉ. विजेंद्र स्नातक
गुरु नानक : साधना मार्ग और विद्रोह की भूमिका- डॉ. महिप सिंह
गुरु नानक की सामाजिक देन- डॉ. धर्मपाल मैनी
गुरु नानक और भारतीय समाज - श्रीमती विजय चौहान
गुरु नानक वाणी में प्रयुक्त ओंकार का विवेचन- डॉ. शारदा गांधी
गुरु नानक की समन्वय - साधना- डॉ. कृष्णदेव झारी
संत परंपरा और गुरु नानक - डॉ.वासुदेव शर्मा
संत नामदेव और गुरु नानक - डॉ. प्रभाकर माचवे
नानकवाणी में भक्ति का स्वरूप - डॉ. सुदर्शन सिंह मजीठिया
गुरु नानक की भक्ति-भावना- यशवीर धर्माणी
संवेदना और विचार
गुरु नानक काव्य का साहित्य मूल्यांकन - डॉ .सूर्यप्रसाद दीक्षित
गुरु नानक की काव्य - प्रतिभा- विश्वप्रकाश दीक्षित 'बटुक'
गुरु नानक का काव्य-संसार- मोहन सपरा
गुरु नानक काव्य के प्रेरणा श्रोत - डॉ. यश गुलाटी
गुरु नानक के काव्य - सिद्धांत- डॉ. सुरेश चंद्र गुप्त
गुरु नानक की काव्य शैली- डॉ. जय भगवान गोयल
गुरु नानक काव्य में रहस्यवादी धारण- डॉ. मनमोहन सहगल
गुरु नानक काव्य: एक प्रभाव - बिंब- महेंद्र प्रताप
नानक वाणी में शाशवतता का संकल्प- डॉ. आत्मजीत सिंह
गुरु नानक की कविता में प्रकृति- डॉ. सुरेंद्र सिंह उप्पल
गुरु नानक कृत बारहमासा वर्णन - डॉ. चंद्रशेखर
जपुजी : एक अध्ययन- डॉ. दिलीप सिंह दीप
'जपुजी' की पांच आत्मिक अवस्थाएं- त्रिलोक दीप
काव्य शैली और शिल्प
गुरु नानक की कविता का बिंब- विधान- डॉ. नरेंद्र मोहन
गुरु नानक की कविता का रूप- विधान- डॉ.ओम प्रकाश शास्त्री
भट्ट कवियों की दृष्टि में गुरुनानक- हरबंस सिंह चावला