पर्यावरण भूगोल या एकीकृत भूगोल पर्यावरणीय दशाओं, उनकी कार्यशीलता और तकनीकी रूप से सबल आर्थिक मानव और पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन स्थानिक तथा कालिक सन्दर्भों में करता है। यह एक तरह का संश्लेषणात्मक विज्ञान है और इसे इंटीग्रेटेड भूगोल (समन्वयात्मक भूगोल) के रूप में भी जाना जाता है। भूगोल कि यह शाखा एक प्रकार से भीतिक भूगोल और मानव भूगोल के विभाजन और बढ़ती दूरियों को कम करने का कार्य करती है। भूगोल सदैव ही मानव और उसके पर्यावरण का अध्ययन स्थान के सन्दर्भों में करता रहा है लेकिन 1950-1970 के बीच भौतिक भूगोल और मानव भूगोल के बीच बढ़ती दूरियों ने इसे पर्यावरण के अध्ययन से विमुख कर दिया था और इस दौरान पर्यावरण के झण्डाबरदार जीव विज्ञानी रहे। बाद में तंत्र विश्लेषण और पारिस्थितिकीय उपागम के बढ़ते महत्व को भूगोल में तेजी से स्वीकृति मिली और पर्यावरण भूगोल, भौतिक और मानव भूगोल के बीच एक बहुआयामी संश्लेषण के रूप में उभरा। पर्यावरण भूगोल के अध्ययन का क्षेत्र- (1) पर्यावरण का एक पारितंत्र के रूप में संगठन और उसकी कार्यशीलता, (2) मानव-पारितंत्रीय संबंध विश्लेषण और पर्यावरणीय अवनयन, (3) पर्यावरणीय दशाओं और मानव-पर्यावरण संबंधों का स्थानिक संदर्भ में अध्ययन, तथा (4) पर्यावरण संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े स्थानिक पहलू (5) भौगोलिक सूचना प्रणाली (जी.आइ.एस.) और सुदूर संवेदन तकनीक का पर्यावरणीय अध्ययन में अनुप्रयोग की दशा और दिशा निर्धारित करना है। अतः प्राकृतिक या भौतिक भूगोल और मानव भूगोल के मध्य समन्वय स्थापित करने और इनके बहु आयामी संश्लेषण, के कारण पर्यावरण भूगोल को एक तीसरी नई शाखा के रूप में भी कुछ विद्वानों द्वारा देखा गया है।
डॉ. यशपाल सिंह नरवरिया वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, पोरसा, मुरैना, मध्य प्रदेश, भारत में सहायक अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से पर्यावरण विज्ञान में एम.एससी. और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय में तकनीकी अधिकारी के रूप में भी कार्य किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों और जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में 12 वर्षों के अध्यापन का अनुभव रखते हैं। उन्होंने पर्यावरण विज्ञान, कृषि-वानिकी और वाणि विज्ञान पढ़ाया है। उनके 15 शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और वे 3 पुस्तकों के लेखक/संपादक भी हैं।
भूमिका अध्याय 1 पर्यावरण भूगोल अध्याय 2 पर्यावरण अध्ययन का इतिहास अध्याय 3 पारिस्थितिकी तंत्र अध्याय 4 जैव-मू-रसायनिक चक्र अध्याय 5 भूगोल में मानव पर्यावरण की संकल्पना अध्याय 6 बायोम (जीवोमद) एवं विश्व के प्रमुख पारिस्थितिकी तन्त्र अध्याय 7 वायु प्रदूषण अध्याय 8 पर्यावरण अवकर्षण, अवनयन और पारिस्थितिकी संकट अध्याय 9 जल प्रदूषण अध्याय 10 ध्वनि एवं रेडियोधर्मी प्रदूषण अध्याय 11 प्राकृतिक संसाधन एवं उनका संरक्षण अध्याय 12 जनसंख्या एवं पर्यावरण अध्याय 13 जैव विविधता एवं संरक्षण अध्याय 14 जलवायु परिवर्तन अध्याय 15 पर्यावरणीय आपदा अध्याय 16 पर्यावरण संरक्षण अध्याय 17 भारत में पर्यावरण की समस्या अध्याय 18 भारत की पर्यावरण नीति अध्याय 19 पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली अध्याय 20 भारत में पर्यावरणीय मुद्दे अध्याय 21 ओजोन परत का क्षरण और इसके परिणाम