स्वाधीनता आंदोलन, स्त्री प्रश्न और उषादेवी मित्रा की कहानियाँ (Swadhinta Andolan Stri Prashan aur Ushadevi Mitra ki Kahaniyan)

सुधा सिंह

Rs.1895.00

9788119680733
Hardcover
Academic Publication
2024

Description

स्त्री केवल इसलिए नहीं लिखती कि उसे लिखना है, सामाजिक उपलब्धि हासिल करनी है, यश कमाना है, प्रशंसा-अनुशंसा प्राप्त करनी है! स्त्री लिखती इसलिए है कि उसे जीना है। अपने को भाषा और अभिव्यक्ति के माध्यम से पुनः पाना है। उस दुनिया की मीमांसा करनी है जिसमें उसके लिए जगह नहीं और इस क्रम में अपने लिए, अपने जैसों के लिए थोड़ी सी जगह बनानी है। उषा देवी मित्रा की कहानियों में समाज में स्त्री की वैविध्यपूर्ण छवियाँ उमरती हैं। शिक्षित, अशिक्षित, विधवा, विवाहिता स्त्रियाँ उनकी रचनाओं में हैं। स्त्री जीवन की विभिन्न मनोदशाओं, अवसाद और खिन्नता के चित्र हैं। समसामयिक राजनीति और आंदोलनों का प्रभाव भी उषा देवी की रचनाओं पर गहरे पड़ा है। परतन्त्रता को, वह चाहे स्त्री की हो या राष्ट्र की वे घृणा के काविल मानती हैं। इन कहानियों की पृष्ठभूमि और भावदशा विविधतापूर्ण है। छायावादी रचनाशीलता और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि को इन कहानियों के विषय चयन और ट्रीटमेंट के माध्यम से सहज ही समझा जा सकता है। राष्ट्रीयता और व्यक्तिमत्ता के संघर्ष के साहित्यिक चित्रण का जो रूप पुरुष रचनाकारों के यहाँ है वह अमूमन यह है कि उन्हें स्त्री के प्रेम और राष्ट्र प्रेम में से एक को चुनना है, और औपनिवेशिक दासता की उस पृष्ठभूमि में स्त्री के प्रति प्रेम और कर्तव्यनिर्वहन से अधिक आवश्यक राष्ट्र और देश के प्रति प्रेम का प्रदर्शन और कर्तव्यनिर्वहन है। यह एक व्यापक दायित्व की तरह दिखाई देता है लेकिन इसमें जिस चीज का निषेध है- वह है व्यक्तिगत, निजी और परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी। राष्ट्र के लिए व्यक्ति का, निज का, परिवार का उत्सर्ग छोटी बात है। यह सत्य है। लेकिन इसके पीछे जो छिपा ली गई बात है, वह कही गई बात से ज़ाहिर नहीं होती, बल्कि ओझल होती है।

About Author

सुधा सिंह : जन्म कोलकाता, प. बंगाल। कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम. हिंदी (स्वर्ण पदक), सुप्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा के आलोचना कर्म पर पीएच.डी। श्री शिक्षायतन महाविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय से व्याख्याता (हिंदी) की नौकरी का आरंभ। तत्पश्चात् विश्वमारती विश्वविद्यालय, प. बंगाल में हिन्दी व्याख्याता के पद पर लगभग पांच वर्षों तक अध्यापन। सन् 2004 में, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडर (मीडिया, जर्नलिज्म और अनुवाद) पद पर नियुक्ति । सन् 2010 से हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और सन् 2020 से हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में ही सीनियर प्रोफेसर पद पर कार्यरत । सन् 2010-12 तक आईसीसीआर चेयर पर अश्गाबात, तुर्कमेनिस्तान में हिंदी भाषा और साहित्य की संस्थापक विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य। आलोचना, मीडिया, पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में अनेक पुस्तकें प्रकाशित। बांग्ला से हिंदी में राससुंदरी दासी की आत्मकथा का 'मेरा जीवन' नाम से अनुवाद। अंग्रेजी से हिंदी में 'जनमाध्यम', 'जनतंत्र जनमाध्यम और वर्तमान संकट', 'सूचना समाज' पुस्तकों का संपादन और अनुवाद। महत्वपूर्ण आलोचना पुस्तकों में 'आधुनिक काल और रामविलास शर्मा', 'ज्ञान का स्त्रवादी पाठ', 'जनमाध्यम सैद्धांतिकी', 'स्त्री संदर्भ में महादेवी', 'स्त्री कथा', 'स्त्री अस्मिताः साहित्य और विचारधारा', 'मध्यकालीन साहित्य विमर्श' (सं), 'मीडिया प्राच्यवाद और वर्चुअल यथार्थ', 'स्वाधीनता संग्राम हिंदी प्रेस और स्त्री का वैकल्पिक क्षेत्र', 'वैकल्पिक मीडिया लोकतंत्र और नॉम चोमस्की' आदि।

Table of Content

एक हैं उषा देवी मित्रा अध्याय 1 प्यासी हूँ अध्याय 2 झूठ अध्याय 3 बूँद-भर पानी अध्याय 4 पिया मिलन की आस अध्याय 5 उसके बाद? अध्याय 6 संधि-वेला में अध्याय 7 उन्नीस सौ पैंतीस अध्याय 8 परदेशी अध्याय 9 “फागुन बीतो जाय फूल कुम्हलाये” अध्याय 10 करें कहां अनुयोग? अध्याय 11 छाया अध्याय 12 खिन्न पिपासा अध्याय 13 बुभुक्षा अध्याय 14 समझौता अध्याय 15 देवी अध्याय 16. अधीर प्रतीक्षा अध्याय 17 रूप की भेंट अध्याय 18 देवदासी अध्याय 19 मन का मोह अध्याय 20 मन की भीख अध्याय 21 मन का अभिसार अध्याय 22 मन का परिचय अध्याय 23 हंसी अध्याय 24 सान्ध्य तारा अध्याय 25 चुम्बन अध्याय 26 मन का यौवन अध्याय 27. मुंह की भाषा गुम हो गयी जब मिल गयी मन की भाषा अध्याय 28 बेकारी का भूत अध्याय 29 नारी का दान अध्याय 30 सोहाग की बिन्दी अध्याय 31 मन का छल अध्याय 32 ...धीरे चलो गगरी छलक न जाए अध्याय 33 कैदी अध्याय 34 रहस्यमयी अध्याय 35 मृत्युहीन स्मृति अध्याय 36 प्यास अध्याय 37 व्यथित आह अध्याय 38 मोटर का भूत अध्याय 39 पीतम अध्याय 40 भूल अध्याय 41 क्षमा अध्याय 42 अन्तरछाया अध्याय 43 तेरे द्वार मैं आश लगाए खड़ा ?